आज की आधुनिक दुनिया (Modern world) में जहाँ विशाल समुद्री जहाज (Cargo ships) और युद्धपोत (Warships) अत्याधुनिक इंजनों (Advanced engines), रडार और जीपीएस (GPS) तकनीक से लैस होते हैं, वहीं भारत ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है जिसने पूरी दुनिया के विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। गुजरात के पोरबंदर (Porbandar) से ओमान के मस्कट (Muscat) की यात्रा पर निकला INSB कौंडिन्य महज एक जहाज नहीं, बल्कि भारत की 2,000 साल पुरानी जहाज निर्माण कला (Ship-building technology) का एक जीवंत प्रमाण है।
2,000 साल पुरानी तकनीक का पुनर्जन्म (Revival of Ancient Technology)
INSB कौंडिन्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निर्माण विधि है। इस जहाज को बनाने में एक भी लोहे की कील (Nail) का उपयोग नहीं किया गया है। प्राचीन काल में भारतीय नाविक जिस ‘सिले हुए जहाज’ (Stitched ships) की तकनीक का उपयोग करते थे, उसी को यहाँ पुनर्जीवित किया गया है। केरल के पारंपरिक कारीगरों (Traditional craftsmen) ने लकड़ी के भारी पाटाओं (Wooden planks) को नारियल की रस्सियों (Coir ropes) से हाथ से सिला है। यह तकनीक जहाज को समुद्र की लहरों के बीच लचीला (Flexible) बनाती है, जिससे वह टूटने के बजाय लहरों के साथ सामंजस्य बिठा लेता है।
अजंता की गुफाओं से मिला प्रेरणास्त्रोत (Inspiration from Ajanta Caves)
हैरानी की बात यह है कि इस जहाज का कोई आधुनिक नक्शा या ब्लूप्रिंट (Blueprint) उपलब्ध नहीं था। भारतीय नौसेना (Indian Navy) और जहाज निर्माताओं ने इतिहास के पन्नों को पलटा और अजंता की गुफाओं (Ajanta Caves) में बने प्राचीन भित्ति चित्रों (Frescoes) का सहारा लिया। उन चित्रों में दिखाए गए जहाजों की संरचना का गहराई से अध्ययन किया गया ताकि भारत की खोई हुई समुद्री विरासत (Maritime heritage) को फिर से समंदर में उतारा जा सके। महान प्राचीन नाविक कौंडिन्य (Kaundinya), जिन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति का विस्तार किया था, उन्हीं के सम्मान में इस जहाज का नामकरण किया गया है।
चुनौतियों से भरा सफर: न इंजन, न जीपीएस (Navigation Challenges)
यह जहाज पूरी तरह से प्राकृतिक शक्तियों (Natural forces) पर निर्भर है। इसमें कोई इंजन नहीं लगाया गया है; इसकी गति पूरी तरह से पवन ऊर्जा (Wind energy) और सूती कपड़े के पालों (Cotton sails) पर निर्भर करती है।
दिशा ज्ञान (Navigation): यात्रा के दौरान नाविक किसी डिजिटल जीपीएस (Digital GPS) का उपयोग नहीं करेंगे। वे दिशा तय करने के लिए ध्रुव तारे (Pole Star), नक्षत्रों (Constellations) और पारंपरिक समुद्री चार्ट्स का उपयोग करेंगे।
यात्रा विवरण (Voyage Details): पोरबंदर से मस्कट तक की यह 1,400 किलोमीटर (750 Nautical miles) की यात्रा लगभग 15 दिनों में पूरी होने की उम्मीद है। इस ऐतिहासिक दल में 13 नाविक और 3 वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं, जो प्राचीन नाविकों की तरह ही कठिन परिस्थितियों का सामना करेंगे।
एक ऐतिहासिक और कूटनीतिक सेतु (Historical and Diplomatic Bridge)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने इस प्रोजेक्ट को भारत के लिए गौरव का क्षण बताया है। उन्होंने कहा कि यह जहाज खाड़ी क्षेत्र (Gulf region) के देशों के साथ हमारे हजारों साल पुराने Trade relations की याद दिलाता है। भारत और ओमान के बीच प्राचीन काल से ही मसालों, कपड़ों और रत्नों का व्यापार इन्हीं रास्तों से होता था। यह मिशन न केवल भारत की स्वदेशी क्षमता (Indigenous capacity) को दर्शाता है, बल्कि ‘सागर’ (SAGAR – Security and Growth for All in the Region) विजन के तहत पड़ोसी देशों के साथ सांस्कृतिक संबंधों को भी मजबूती देता है।
