वॉशिंगटन डीसी : राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ‘अमेरिका फर्स्ट’ (America First) एजेंडे को वैश्विक स्तर पर मजबूती से लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। ट्रंप प्रशासन ने दुनिया भर के विभिन्न देशों में तैनात लगभग 30 अमेरिकी राजदूतों को वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस फैसले ने न केवल वॉशिंगटन के गलियारों में, बल्कि वैश्विक कूटनीतिक हलकों में भी हलचल मचा दी है।
विदेश नीति में बदलाव की सुगबुगाहट
प्रशासन से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, इस कदम का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी विदेश नीति को राष्ट्रपति ट्रंप की प्राथमिकताओं के अनुरूप ढालना है। हालांकि, अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि इन राजदूतों को बर्खास्त नहीं किया जा रहा है। इसके बजाय, उन्हें अमेरिकी विदेश विभाग (स्टेट डिपार्टमेंट) में अन्य महत्वपूर्ण रणनीतिक जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बयान जारी कर कहा, “यह हर प्रशासन में होने वाली एक सामान्य प्रक्रिया है। राजदूत सीधे तौर पर राष्ट्रपति का प्रतिनिधि होता है। ऐसे में राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह उन अधिकारियों को तैनात करें जो उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ दृष्टिकोण को सबसे प्रभावी ढंग से लागू कर सकें।”
जनवरी 2026 तक का समय
सूत्रों के अनुसार, पिछले सप्ताह कम से कम 29 देशों के मिशन प्रमुखों को आधिकारिक तौर पर सूचित कर दिया गया था कि उनका वर्तमान कार्यकाल जनवरी 2026 में समाप्त हो जाएगा। वापस बुलाए गए अधिकांश अधिकारी ‘कैरियर फॉरेन सर्विस’ से जुड़े अनुभवी राजनयिक हैं। इनमें से कई की नियुक्ति जो बाइडेन के कार्यकाल के दौरान हुई थी। शुरुआत में ये अधिकारी ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआती छंटनी से बच गए थे, लेकिन व्हाइट हाउस के ताजा नोटिस के बाद अब उनकी स्वदेश वापसी तय हो गई है।
इन क्षेत्रों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर
राजदूतों की वापसी की सूची यह दर्शाती है कि ट्रंप प्रशासन किन क्षेत्रों में अपनी पकड़ दोबारा बनाना चाहता है:
- अफ्रीका: सबसे बड़ा प्रभाव इसी महाद्वीप पर देखा गया है। नाइजीरिया, सेनेगल, रवांडा, सोमालिया और युगांडा समेत कुल 13 देशों से राजदूत वापस बुलाए गए हैं।
- एशिया-प्रशांत: फिलीपींस, वियतनाम, लाओस, पापुआ न्यू गिनी और फिजी जैसे महत्वपूर्ण देशों में तैनात राजदूतों को बदला जा रहा है।
- दक्षिण एशिया: भारत के पड़ोसी देशों नेपाल और श्रीलंका में तैनात अमेरिकी राजदूतों की भी वापसी हो रही है।
- यूरोप और मध्य पूर्व: आर्मेनिया, स्लोवाकिया, मिस्र और अल्जीरिया जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देशों में भी नेतृत्व परिवर्तन होगा।
राजनीतिक विरोध और आलोचना
ट्रंप सरकार के इस बड़े फैसले पर विपक्षी डेमोक्रेट्स ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। सीनेट फॉरेन रिलेशंस कमेटी की शीर्ष डेमोक्रेट सदस्य, सीनेटर जीन शाहीन ने इस कदम को अमेरिकी कूटनीति के लिए घातक बताया है।
शाहीन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर लिखा, “अनुभवी और योग्य राजदूतों को अचानक हटाकर राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को कमजोर कर रहे हैं। इस तरह के रिक्त स्थान चीन और रूस जैसे प्रतिस्पर्धियों को अपना प्रभाव बढ़ाने का मौका देंगे।” डेमोक्रेट्स का तर्क है कि कई देशों में पहले से ही राजदूतों के पद खाली हैं, और इस नए फैसले से अमेरिकी दूतावासों में कामकाज प्रभावित हो सकता है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि इन पदों पर अब उन लोगों की नियुक्ति की जा सकती है जो ट्रंप की व्यापारिक नीतियों और सख्त विदेश नीति के कट्टर समर्थक हैं। आने वाले महीनों में स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा नए नामांकनों की घोषणा की जा सकती है, जिसके बाद सीनेट में उनकी पुष्टि की प्रक्रिया शुरू होगी।
