नई दिल्ली/डोमिनिकन रिपब्लिक: धरती के फेफड़े कहे जाने वाले जंगलों की तरह समुद्र के भीतर कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें)(Coral reef) तटों की रक्षा करती हैं। लेकिन बढ़ते तापमान और प्रदूषण के कारण ये तेजी से खत्म हो रहे हैं। अब डोमिनिकन रिपब्लिक के वैज्ञानिकों ने इन्हें बचाने के लिए इंसानों की IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) जैसी तकनीक अपनाई है।
समुद्र के भीतर कोरल की अनोखी ‘नर्सरी’
डोमिनिकन रिपब्लिक के तटों पर गहरे पानी में धातु के मकड़ी जैसे ढांचों पर हजारों नन्हे कोरल बेबीज को पाला जा रहा है। ‘फुंडेमार’ (Fundemar) नामक संस्था के संरक्षणकर्ता माइकल डेल रोसारियो इन कोरल नर्सरियों की देखभाल करते हैं। यहाँ कोरल के अंडे और स्पर्म को लैब में मिलाकर नए कोरल तैयार किए जाते हैं, जिसे ‘असिस्टेड फर्टिलाइजेशन’ कहा जाता है।
प्राकृतिक प्रजनन में आ रही थीं ये बाधाएं
जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का पानी गर्म हो रहा है, जिससे 70% रीफ पर कोरल कवरेज 5% से भी कम रह गया है। स्वस्थ कोरल कॉलोनियां एक-दूसरे से इतनी दूर हो गई हैं कि प्राकृतिक रूप से उनके अंडों का मिलन असंभव सा हो गया है। इसी चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिक खुद अंडे और स्पर्म इकट्ठा कर लैब में भ्रूण (Embryo) तैयार कर रहे हैं।
क्यों जरूरी है यह नई तकनीक?
जेनेटिक विविधता: पहले कोरल के टुकड़े काटकर दूसरी जगह लगाए जाते थे (क्लोनिंग), जिससे पूरी आबादी एक ही बीमारी से खत्म होने का डर रहता था। अब ‘सेक्शुअल रिप्रोडक्शन’ से पैदा हुए कोरल जेनेटिक रूप से अलग और मजबूत हैं।
सफलता की दर: लैब में हर साल 25 लाख से ज्यादा कोरल भ्रूण बनाए जाते हैं। हालांकि समुद्र में सिर्फ 1% ही बच पाते हैं, लेकिन यह प्राकृतिक दर से कहीं बेहतर है।
तटों की सुरक्षा: कोरल रीफ समुद्र की लहरों और तूफानों से जमीन की रक्षा करते हैं। इनके खत्म होने से बीच (Beach) की रेत और पर्यटन दोनों खतरे में हैं।
मछुआरों की बढ़ती मुश्किलें
स्थानीय मछुआरे अलिडो लुइस बाएज के अनुसार, 1970 के दशक में तट के पास ही भरपूर मछलियाँ मिल जाती थीं। आज कोरल के विनाश और जलवायु परिवर्तन के कारण मछुआरों को मछली पकड़ने के लिए 80 किलोमीटर दूर समुद्र में जाना पड़ता है।
उम्मीद की किरण
यह तकनीक अब मैक्सिको, क्यूबा, प्यूर्टो रिको और जमैका जैसे देशों में भी फैल रही है। माइकल डेल रोसारियो कहते हैं, “ये कोरल बच्चे हमें उम्मीद देते हैं कि सब कुछ खत्म नहीं हुआ है, लेकिन अगर हमने जलवायु परिवर्तन नहीं रोका, तो ये कोशिशें भी कम पड़ सकती हैं।”
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