भारतीय क्रिकेट का इतिहास केवल शानदार जीत, वर्ल्ड कप और शतकों की कहानियों से नहीं भरा है। इसके पन्नों में कुछ ऐसी कड़वी यादें भी दर्ज हैं जो आज भी खेल प्रेमियों को शर्मसार कर देती हैं। ऐसी ही एक घटना साल 1991 में दलीप ट्रॉफी के फाइनल के दौरान घटी थी, जिसने खेल भावना की धज्जियां उड़ा दी थीं।
मैदान का माहौल: नॉर्थ जोन बनाम वेस्ट जोन
जनवरी 1991, जमशेदपुर का कीनन स्टेडियम खचाखच भरा था। मौका था दलीप ट्रॉफी के फाइनल का। मैदान पर भारतीय क्रिकेट के दो दिग्गज कप्तान आमने-सामने थे—नॉर्थ जोन की कमान कपिल देव के हाथों में थी, तो वेस्ट जोन का नेतृत्व रवि शास्त्री कर रहे थे। मैच काफी रोमांचक मोड़ पर था। नॉर्थ जोन ने पहली पारी में 729 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया था, जिसके जवाब में वेस्ट जोन 561 रनों पर सिमट गई थी।
मैच के पांचवें और आखिरी दिन नॉर्थ जोन दूसरी पारी खेल रही थी। सलामी बल्लेबाज रमण लांबा और अजय जडेजा क्रीज पर थे। मैच का नतीजा लगभग तय था और किसी ने सोचा भी नहीं था कि अगले कुछ मिनटों में जो होगा, वह इतिहास में दर्ज हो जाएगा।
टकराव की शुरुआत: रमन लांबा और राशिद पटेल
बड़ौदा के तेज गेंदबाज राशिद पटेल वेस्ट जोन की ओर से गेंदबाजी कर रहे थे। राशिद, जिन्होंने भारत के लिए एक टेस्ट मैच खेला था, उस दिन काफी आक्रामक मूड में थे। दूसरी तरफ रमण लांबा भी अपनी आक्रामक बल्लेबाजी और ‘स्लेजिंग’ (मैदान पर छींटाकशी) के लिए जाने जाते थे।
खेल के दौरान राशिद पटेल ‘राउंड द विकेट’ आकर खतरनाक गेंदबाजी कर रहे थे। गेंदें बल्लेबाजों के शरीर को निशाना बना रही थीं। रमण लांबा को यह रास नहीं आया और उन्होंने बल्ले का हैंडल दिखाकर राशिद को कुछ तीखा इशारा किया। बस, यहीं से बात बिगड़ गई।
वो शर्मनाक मंजर: जब हाथ में ‘हथियार’ बन गया स्टंप
गुस्से से लाल राशिद पटेल ने मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं। उन्होंने अगली गेंद लगभग आधी पिच से ‘बीमर’ (बिना टप्पा खाए सीधे सिर की ऊंचाई पर) फेंकी। लांबा का सिर बाल-बाल बचा। लांबा ने विरोध जताया, तो राशिद पटेल का आपा पूरी तरह खो गया।
राशिद ने दौड़कर विकेट से स्टंप उखाड़ा और उसे भाले की तरह थामकर रमण लांबा की ओर दौड़ पड़े। मैदान पर मौजूद खिलाड़ी, अंपायर और दर्शक यह देखकर सन्न रह गए। राशिद ने लांबा पर हमला करने की कोशिश की और उन्हें थर्ड मैन बाउंड्री तक दौड़ाया। लांबा अपनी जान बचाने के लिए भागते रहे। क्रिकेट के मैदान पर ऐसी हिंसा पहले कभी नहीं देखी गई थी।
मैदान बना जंग का मैदान
खिलाड़ियों के बीच की इस लड़ाई ने दर्शकों को भी भड़का दिया। स्टेडियम में मौजूद भीड़ ने मैदान पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए। इसी बीच बाउंड्री पर फील्डिंग कर रहे युवा विनोद कांबली को एक पत्थर लगा और वे घायल हो गए। स्थिति इतनी नियंत्रण से बाहर हो गई कि खेल को तुरंत रोकना पड़ा। पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और खिलाड़ियों को सुरक्षा घेरे में पवेलियन ले जाया गया। मैच वहीं खत्म हो गया और नॉर्थ जोन को विजेता घोषित कर ट्रॉफी अंदर ही सौंप दी गई।
सजा और प्रतिबंध
इस घटना के बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने कड़ी कार्रवाई की:
राशिद पटेल: हिंसा फैलाने के आरोप में उन पर 13 महीने का प्रतिबंध लगाया गया। इस घटना ने उनके करियर को लगभग खत्म कर दिया।
रमण लांबा: उकसावे और छींटाकशी के लिए उन पर भी 10 महीने का प्रतिबंध लगा।
रमण लांबा: एक दुखद अंत
रमण लांबा की कहानी इस विवाद के कुछ सालों बाद एक बड़ी त्रासदी में बदल गई। 1998 में बांग्लादेश के ढाका में एक क्लब मैच के दौरान वे शॉर्ट लेग पर बिना हेलमेट के फील्डिंग कर रहे थे। बल्लेबाज मेहराब हुसैन का एक शॉट सीधे उनके सिर पर लगा। तीन दिनों तक अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ने के बाद, महज 38 साल की उम्र में लांबा का निधन हो गया।
1991 की वह घटना आज भी याद दिलाती है कि खेल में अनुशासन और संयम कितना महत्वपूर्ण है। राशिद पटेल का वह गुस्सा और रमण लांबा की वह दौड़ क्रिकेट के इतिहास पर एक ऐसा धब्बा है, जिसे कभी धोया नहीं जा सकेगा। यह घटना सिखाती है कि मैदान पर मुकाबला गेंद और बल्ले से होना चाहिए, न कि हिंसा से।
