गांधीनगर: गुजरात में पिछले कुछ समय से ‘प्रेम विवाह’ (Love Marriage) और उसमें माता-पिता की अनिवार्य सहमति को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। राज्य सरकार इस बात पर गंभीरता से विचार कर रही है कि क्या विवाह के पंजीकरण (Registration) के लिए माता-पिता के हस्ताक्षर को अनिवार्य बनाया जा सकता है।
विवाद की मुख्य वजह
गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से संकेत दिया था कि सरकार प्रेम विवाह के लिए माता-पिता की सहमति अनिवार्य करने की संभावनाओं का अध्ययन कर रही है। इसके पीछे मुख्य तर्क यह दिया जा रहा है कि:
- पारिवारिक मूल्यों का संरक्षण: कई सामाजिक संगठनों का मानना है कि युवा बिना सोचे-समझे घर से भागकर शादी कर लेते हैं, जिससे परिवारों में दरार पैदा होती है।
- अपराधों में कमी: सरकार का मानना है कि इस कदम से ‘लव जिहाद’ जैसे मामलों और जबरन विवाह या धोखाधड़ी के मामलों पर रोक लग सकती है।
- सामजिक दबाव: विशेष रूप से पाटीदार समाज और अन्य समुदायों द्वारा यह मांग लंबे समय से की जा रही है कि विवाह तभी मान्य हो जब उसमें कम से कम एक अभिभावक की गवाही हो।
संवैधानिक और कानूनी पेच
हालांकि यह प्रस्ताव सुनने में सामाजिक रूप से प्रभावी लग सकता है, लेकिन इसके सामने कई कानूनी चुनौतियाँ हैं:
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता: भारत का संविधान अनुच्छेद 21 के तहत हर वयस्क नागरिक को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है।
- सुप्रीम कोर्ट का रुख: सर्वोच्च न्यायालय ने कई फैसलों (जैसे ‘हादिया केस’) में साफ कहा है कि दो वयस्क यदि अपनी मर्जी से साथ रहना चाहते हैं, तो इसमें राज्य या परिवार हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
- विशेष विवाह अधिनियम: वर्तमान कानूनों के अनुसार, 18 वर्ष से ऊपर की महिला और 21 वर्ष से ऊपर का पुरुष स्वतंत्र रूप से विवाह कर सकते हैं।
विपक्ष और सामाजिक प्रतिक्रिया
जहाँ एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों और पारंपरिक समाजों में इस विचार का स्वागत किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और युवाओं ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। उनका तर्क है कि यह कानून युवाओं की निजता और स्वतंत्रता का हनन करेगा। यदि माता-पिता किसी कारणवश विवाह के विरुद्ध हैं, तो यह कानून युवाओं के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।
निष्कर्ष
फिलहाल, गुजरात सरकार ने इस पर कोई आधिकारिक कानून लागू नहीं किया है। सरकार केवल इस विषय के कानूनी पहलुओं की जांच कर रही है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यदि ऐसा कोई नियम बनाया जाता है, तो वह अदालत में टिक सके। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि यदि संविधान के दायरे में रहकर ऐसा कोई प्रावधान संभव हुआ, तो सरकार इस दिशा में आगे बढ़ेगी।
