महाराष्ट्र में 29 नगरपालिकाओं और महानगरपालिकाओं (जैसे BMC और PMC) के चुनाव नजदीक आते ही राज्य की राजनीति ने एक नया मोड़ ले लिया है। सत्ता की इस जंग में अब दो नहीं, बल्कि तीन मुख्य गठबंधन उभरकर सामने आए हैं, जिसने पारंपरिक समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।
1. भाजपा और शिंदे की शिवसेना: केवल दो का साथ
राज्य की सत्ता में ‘महायुति’ का हिस्सा होने के बावजूद, स्थानीय चुनावों के लिए भाजपा ने अपनी रणनीति बदल ली है।
समीकरण: भाजपा ने उपमुख्यमंत्री अजीत पवार की एनसीपी को साइडलाइन करते हुए केवल एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ गठबंधन किया है।
लक्ष्य: भाजपा का मानना है कि शिंदे की शिवसेना उनकी ‘स्वाभाविक सहयोगी’ है और वे मिलकर BMC सहित सभी 29 निगमों में चुनाव लड़ेंगे।
2. पवार परिवार का पुनर्मिलन: चाचा-भतीजा एक साथ
अजीत पवार, जिन्हें भाजपा और शिंदे ने स्थानीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश की, उन्होंने एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए अपने चाचा शरद पवार से हाथ मिला लिया है।
समीकरण: अजीत पवार की NCP और शरद पवार की NCP (SP) पुणे (PMC) और पिंपरी-चिंचवड़ में मिलकर चुनाव लड़ेंगी।
पुणे का गणित: पुणे में सीटों के बंटवारे पर चर्चा जारी है। माना जा रहा है कि शरद पवार का गुट 40-45 सीटों की मांग कर रहा है, जबकि अजीत पवार का गुट 30 सीटें देने को तैयार है।
3. ठाकरे भाई और कांग्रेस: ‘ब्रांड ठाकरे’ की वापसी
सबसे बड़ा उलटफेर विपक्षी खेमे में हुआ है, जहाँ लंबे समय बाद ठाकरे भाई एक मंच पर आए हैं।
समीकरण: उद्धव ठाकरे (शिवसेना UBT) और राज ठाकरे (MNS) ने हाथ मिला लिया है। पुणे में कांग्रेस भी इस गठबंधन का हिस्सा बन गई है।
खास बात: मुंबई (BMC) में कांग्रेस ने अकेले लड़ने का फैसला किया है, लेकिन पुणे में वह ठाकरे भाइयों के साथ है। यह गठबंधन मराठी वोट बैंक को साधने और ‘मराठी मानुस’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है।
भविष्य की राजनीति पर असर
ये नए समीकरण न केवल इन नगर निगम चुनावों के नतीजे तय करेंगे, बल्कि आगामी विधानसभा की दिशा भी तय कर सकते हैं। राज्य सरकार में साथ होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर अलग-अलग लड़ना यह दर्शाता है कि महाराष्ट्र की राजनीति में ‘कोई स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता’।
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